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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

इन्द्रियो को जीतने का तरीका

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य‌ स्वरूपानुसार इवेन्द्रियाणाम् प्रत्याहार:.(योग 2.54)

अपनी इन्द्रियो को बुरे मार्ग से हटा के अच्छे मार्ग पर लगाना ही इन्द्रियो को जित लेना कहाता है.इसे जितेन्द्रियता भी कहते है.हमारी इन्द्रिया उन विषयो मे जाती है जिनमे उन्हे सुख् मिलता हो.जैसे कभी कभार रसगुल्ले खाने की इच्छा होना.कभी कभार मैथुन करने की इच्छा होना इत्यादि,इन सब से बचने के लिये मै कुछ् उपाय योग के माध्यम से कहता हू,आप विद्वान लोग बतावे कि ये तरीके सही है वा नही.
हमारी पान्च इन्द्रिया है,आन्ख्,नाक,कान,जिह्वा और् त्वचा.
(1)आन्ख को सुन्दर द्ऋश्यो को न देखने देवे.जैसे किसी सुन्दर स्त्री को देखना.जो आप सुन्दर द्ऱ्श्यो को देखोगे तो आपकी इच्छा बुरे कर्म करने की हो सकती है.क्योकि इन्द्रिया और मन उन्ही कर्मो मे जाते है जिनमे सुख होता है वे यह नही जानते है कि ये कर्म अच्छे है वा बुरे.
(2)नाक से ज्यादा सुगन्धित पदार्थो को सुङ्हने की आदत न बनावे.क्योकि आपकी इन्द्रिया अपने वश मे नही रहने वाली है.
(3)श्रोत्र से गाना,बाजा बजाना,ऐसी स्त्री से बाते करना जिसकी आवाज बहुत ही मधुर हो,ये कर्म नही करने चाहिये.क्योकी गाना‍बाजा सुनने से उससे प्रेम हो जाता है और् मन मे बार बार वह गाना बाजा सुनने की इच्छा हो सकती है.जिससे मन नही टिकेगा.मधुर आवाज वाली स्त्री से सम्वाद करने से वह स्त्री मन मे बार बार आने से मैथुन करने की इच्छा होवेगी.
(4)जिह्वा से खट्टे,मीठे व चरके पदार्थो ग्रहण न करे.क्योकि जो ऐसे पदार्थ खावे तो उन्हे खाने की बार बार इच्छा होती है और् फिर वह रोगग्रस्त हो जाता है.अपने मन मे इच्छ उत्पन्न होगी और हम हमारी जिह्वा पर नियन्त्रण भी नही रख सकेगे.
(5)मुलायम,ग्रमी मे ठन्डा,और् सर्दी मे गर्मी का सेवन न करे क्योकि उससे आलस पैदा होकर के मन चन्चल हो जायेगा.महर्षि दयानन्द,जैसे कि भवानी लाल भारतिय जी ने अपने बनाये बहुए ग्रन्थ मे लिखा है,हमेश बिन दरी व तकिया लगाये नीचे ही सोते थे.जनवरी फरवरी जैसे मौसम मे बाह‌र बिना कुछ पहने सोते थे.गर्मी मे धूप मे काम किया करते थे.मै ऐसा सम्झता हू कि तभी वे जितेन्द्रिय थे.

विनय आर्य‌

Namastey vinay arya

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Dhanyavad

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यदि समाधि

यदि समाधि का अनुभव करने के बात किसी कारणवश समाधि से चित्त हट जाये तो क्या करना चाहिये?यदि समाधि का अनुभव करने के बात किसी कारणवश समाधि से चित्त हट जाये तो क्या करना चाहिये?

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false
नमस्ते आर्य बसन्तजी
आज इतने दिनो बाद आप यहा दिखायी दिये है.प्रथम तो आप समाधी मे इस तरह से प्रवेश करे जैसे एक समुद्र मे नदी प्रविष्ट होती है.इसका मतलब है कि पूरी श्रद्धा व समर्पण भावना से परमात्मा मे प्रवेश करे.फिर केवल उसी का ही चिन्तन करे और अन्य किसी वस्तु का नही.जब आप परमात्मा को छोडकर किसी भी अन्य वस्तु का चिन्तन न करेगे तो स्वत: ही आपका ध्यान न टूटेगा.महर्षि दयानन्द 18 18 घन्टो तक भी समाधी मे लीन रहते थे.

ॐ..धन्यवाद

ॐ..धन्यवाद Jvb ji

ॐ..क्या

ॐ..क्या समाधि के बाद संन्यास लेना आवश्यक होता है?

जो व्यक्ति

जो व्यक्ति सन्यास लेना चाहे वो ले सकते है और् जो न लेना चाहे वो नही भी ले सकते है.क्योकि समाधि तो योगाङ है,उसे तो कोई भी कर सकता है.आपने ऐसा क्यो समझा जी?

धन्यवाद।

विनय आर्य

ॐ..नमस्ते

ॐ..नमस्ते विनय जी,
मैने सुना है कि समाधि लगाने में अनेक जन्म लग जाते है। समाधि को बनाये रखने के लिऐ संन्यास लेना चाहिये।

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false
यदि कोई व्यक्ति दश दिन‌ भी अगर रोजना चार घन्टो तक प्रयास करे तो ग्यारहवे दिन समाधि लग जाती है.अब किसी व्यक्ति को अनेक जन्म लगे तो वह उसकी एक खूबी है.महर्षि पतनज्लि ने कहा है कि अभ्यास व वैराग्य से समाधि जल्दि लगती है.वैराग्य का मतलब होता है विवेक.जो विवेकि हो वही समाधी जल्दी लगा सकता है.विवेक बढता है स्वाद्याय से.और् वो भी आर्ष ग्रन्थो का.जो व्यक्ति अन्य ग्रन्थो से पचास वर्ष‌ मे जो विवेक नही प्राप्त कर सकता है वही व्यक्ति आर्ष ग्रन्थो से बहुत ही अल्प समय मे उससे ज्यादा विवेक प्राप्त कर सकता है.
अब आपको और मुझे न पता यह मेरा कौनसा जन्म है,पिछ्ले कितने जन्म मै ले चुका हू?तो अत: यह बात छोडकर निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये.देखो।मै शुरुआति दिनो मे आई.आई.टी. की सबसे कठिन समस्याए आधे घन्टो मे हल नही कर सकता था जबकि जो विद्वान थे वे आधे मिनट से भी कम समय मे हल कर देते थे.कहा आधा घन्टा और कहा आधा मिनट.किन्तु,अब मै भी आधे मिनट मे हल कर सकता हू.अब यह इसी जन्म की बात है पिछले जन्म की नही.यानी होशियार बनने के लिये अनेक जन्म नही लेने पडते है.अत: मै और आप चाहे पिछले जन्मो मे योग का नाम तक न सुना हो फिर भी इसी जन्म मे समाधि लगा सकते है.
जो भगवान श्रीक्ऋष्ण थे,वे योगेश्वर थे,और उन्होने बिना सन्यास लिये समाधि लगायि थी.तो अत: समाधि लेने के लिये सन्यास लेने की कोई आवश्यकता नही पडती है.भगवान राम भी योगी थे.

ॐ..क्या

ॐ..क्या आपने समाधि का अनुभव किया है?

हा,समाधि

हा,समाधि का अनुभव किया है.

ॐ..नमस्ते

ॐ..नमस्ते जी, कौन सी समाधि? असम्प्रज्ञात समाधि का अनुभव किया है?

नमस्ते मै

नमस्ते
मै समाधि उस को कहता हू जिसमे केवल एक ही वस्तु का चिन्तन होवे.परमेश्वर ही वही वस्तू है जिस पर ध्यान टिकाया जा सकता है.अन्य वस्तुओ पर टिकाने से मन इधर उधर जाता है.अत: मैने केवल परमेश्वर पर ही समाधी धरी है.