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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: सन्तान उपकारी

ओ३म् जनीयन्तो त्वग्रव: पुत्रीयन्त सुदानव:।
सरस्वन्तं हवामहे ।।साम १४६० ।।

अब कृपा करो मां सरस्वती, हमने मां तुम्हें पुकारा है ।
यह जीवन सरस बना दो मां, अति दुष्कर पन्थ हमारा है ।।

जाया को हमने पाया है,
क्या केवल भोग रचाया है,
तर जाँय परस्पर हाथ पकड़
यह जग प्रपात जो आया है ।

दोनों को पार लगा देता, दम्पति का सरस सहारा है ।
यह जीवन सरस बना दो मां, अति दुष्कर पन्थ हमारा है ।।

जो सम्पत्ति हमने जोडी है,
कुछ अधिक नहीं बस थोड़ी है,
हो इससे आगे दान धर्म
सो सन्तति पर यह छोड़ी है ।

सन्तान सुदानी योग्य बने, वांछित उपकारी तुम्हारा है ।
यह जीवन सरस बना दो मां, अति दुष्कर पन्थ हमारा है ।।

जाया ने हमें बढ़ाया है,
सन्तति से हमें मिलाया है,
सन्तान श्रमी उपकारी दे,
प्रभु ने रसपान कराया है ।

रस जिसको यह मिल जाता है, तर जाता वह भव- धारा है ।
यह जीवन सरस बना दो मां, अति दुष्कर पन्थ हमारा है ।।

Rajendra P.Arya
9041342483 (Mobile)

पं.

पं. देवनारायण भारद्वाज जी रचित सामवेद के इस मन्त्र का काव्यानुवाद बहुत सुन्दर प्रेरणादायक है ।
भारद्वाज जी बड़े विनम्र स्वभाव के उच्चकोटी के विद्वान हैं जिन्होंने कुल आठ कृतियां मेरी छोटी सी मा‍ग पर कोरीयर द्वारा भेजी हैं जिनमें महर्षि दयानन्द के भक्तिपूर्ण ग्रन्थ "आर्याभिविनय" के मन्त्रों का गीतानुवाद "गीतस्तुति" विशेष‌ है।
मैं उनका अति आभारी हूँ।

राजेन्द्र आर्य‌

B.S.Sharma bhahut sunder

B.S.Sharma
bhahut sunder