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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : प्रिया प्रियाओं में

ओ३म् उत न: प्रिया प्रियासु सप्त स्वसा सुजुष्टा ।
सरस्वती स्तोम्या भूत् ।। साम १४६१ ।।

मैं और किसी से क्या मांगू, तू ने तो सब कुछ दान किया ।
हे मेरी देवी सरस्वती, मैंने तेरा ही गान किया ।।

जग में तो रहती बहुत प्रिया,
पर तुझसे बढ़कर कौन प्रिया,
लक्ष्मी आदिक को कौन बात
तू सभी प्रिया में परम प्रिया ।

तेरा साहचर्य सुरीला है, जिसका मैंने रसपान किया ।
हे मेरी देवी सरस्वती, मैंने तेरा ही गान किया ।।

तू एक हमें मिल जायेगी,
तो सात बहिनियां लायेगी,
सप्त छन्द स्वर, सप्त धातु धर
हमको सम्पन्न बनायेगी ।

एक वरण से सप्त शरण हों, तू ने वरदान प्रदान किया ।
हे मेरी देवी सरस्वती, मैंने तेरा ही गान किया ।।

स्मृति, मेधा, बुद्धि, वक् हैं,
चतुराई की बड़ी धाक है,
निष्ठा उत्कण्ठा साथ हुई
इन सातों से पुण्य पाक है ।

अहम् मिटाया प्रेम पगाया, तब तुमने भी प्रतिपादन किया ।
हे मेरी देवी सरस्वती, मैंने तेरा ही गान किया ।।

राजेन्द्र आर्य‌