Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अब मै कहता हू योग=विग्यान‌

आजकल के वैग्यानिक युग मे योग को अवैग्यानिक इसलिये कहा जाता है क्योकि उसको समझाने वाले और समझने वाले दोनो नादान है.योग बिल्कुल ही वैग्यानिक है.वह विद्या वेदो से ही ली गयी है.जो योगाभ्यासी है वह एक physicist,chemist,biologist,neurologist,physician आदि है.यदि किसी को इन सब उपाधियो को ग्रहण करना है तो उसे सम्प्रग्यात समाधि लगानी पडेगी.प्रस्तुत् है एक योगसूत्र.

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रग्यात:. (योग. 1.17)
अर्थ: (1)वितर्क सम्प्रग्यात् समाधि=इस समाधि मे चित्त को केवल एक वस्तु पर टिकाना होता है.जिसमे प्ऋथ्वी आदि पान्च भूतो को जानने के लिये चित को एकाग्र किया जाता है उसे वितर्क सम्प्रग्यात् समाधि कहते है.
प्ऋथ्वी,वायु,जल,अग्नि और आकाश ये पान्च भूत है.इन सबको जानने का प्रयास हमे करना पडेगा.उसके लिये हमे हमारे चित्त को किसी भी एक भूत पर एकाग्र करना पडेगा.मान लो हम प्ऋथ्वी पर अपने चित्त को एकाग्र करते है.चित्त को एकाग्र करने के लिये उस केवल प्ऋथ्वी को ही देखना पडेगा और अन्य वस्तु को चित्त मे प्रवेश भी नही होने देना है. फिर आगे का step:
(2)विचार सम्प्रग्यात् समाधि= चित को प्ऋथ्वी पर‌ एकाग्र करने के बाद उसके बारे मे सोचने लगे.जैसे‍ यह किससे बनी है,यह जड है वा चेतन,यह कितनी मोटी है,इसका आकार क्या है इत्यादि.फिर आप इन प्रश्नो का जवाब किसी न किसी तरह से ढून्ढ लेवे.फिर इस प्ऋथ्वी को छोडे न.फिर और अधिक सोचकर खोजकर ग्यान को बढावे.यदि ऐसा अभ्यास बहुत ही लम्बे काल तक किया जाय तो हम एक physicist,chemist बन जायेगे.
(3)आनन्द सम्प्रग्यात् समाधि= जिस अवस्था मे इन्द्रियो के द्वारा स्वयम् के चित्त का साक्षात्कार‌ होवे वह आनन्द सम्प्रग्यात् समाधि.यह कैसे होवे?योग‌शास्त्र मे चित्त और मन एक ही वस्तू है.यानी हमे मन का साक्षात्कार करना है.वह कैसे?हमारी पान्च इन्द्रिया है,आन्ख,कान,नाक,जीभ,और त्वचा.इनसे हमे sensation किस प्रकार से होता है यह जानना है.ऐसा जानने के लिये biology के ग्यान की आवश्यकता है.न्यूरोन्स्,नर्वस सिस्टम आदि की.
तो इसके लिये हमे वे पुस्तके और खोजे करनी पडेगी.फिर इसको जानकर अपने चित्त को जानो कि यह किस प्रकार चलता है.मै इसे कैसे चला सकता हू?फिर अन्त मे :
(4)अस्मिता सम्प्रग्यात् समाधि=इसमे आत्मा का सक्षात्कार होता है.मन के बारे मे जानने के पश्चात् यह सोचे कि इस मन को कौन चलता है,वह कौन है वह कहा है वह कैसा है वह क्या मरता है.इस प्रकार यह सब जाने.
तो इस प्रकार जड पदार्थो से लेकर के आत्मा का ग्यान भी आप कर सकते है योग के माध्यम् से.फिर वह केवल एक वस्तू शेष रह जाती है वह है ईश्वर.उसका साक्षात्कार असम्प्रग्यात् समाधि मे होता है जिसमे केवल ईश्वर ही के गुणे केवल ईश्वर के ही गुणो के बारे मे विचारा जाता है.
तो इस प्रकार से जो योगी है वह सबका(सिवाय ईश्वर के) गुरु है.
जो योगी है वही आर्य है.
जो आर्य है वही तो सबका (सिवाय ईश्वर के)गुरु है.क्योकि जो योगी है वही आर्य है.

जो योगी है वही आर्य है इसका प्रमाण मै पहले दे चुका हू.तो अब आप सोच लीजिये कि हम आज कहा है.कितने पानी मे है और कितने ऊपर है.

धन्यवाद।

विनय आर्य

ॐ..नमस्ते

ॐ..नमस्ते प्रिय मित्र विनय आर्य जी, विज्ञान= vijyaan.
सम्प्रज्ञात=Samprajyaat
-ये सही उच्चारण है।

श्री बसन्त

श्री बसन्त जी
मुझे सही उच्चारण तो पता है लेकिन शुद्ध लिखने की सुविधा नही मिल पा रही है.यहा के hinglish typewriter मे "ज्य" लिखनै की सुविधा नही है.क्ऋपया आप मेझे कुछ बताये जिससे मै शुद्ध लिख तो सकु.जैसे अब मैने क्ऋपया लिखा है,इसमे आधा 'क' तो अलग है और 'ऋ' अलग है.ऐसी ही सुविधा मेझे मिल पा रही है.

धन्यवाद।

ॐ..download 'Microsoft

ॐ..download 'Microsoft indic language tool' . Google it

वैदिक

वैदिक योगविद्या को ठीक से जानने के लिए निम्न पुस्तकें उपयोगी हैं -
१. सरल योग से ईश्वर साक्षात्कार - ले० स्वामी सत्यपतिजी
२. God Realization through Simplified Yoga - उक्त पुस्तक का अन्ग्रेजी अनुवाद
३. योग दर्शन - (भाष्य) - ले० स्वामी सत्यपतिजी
४. योग मीमांसा - ले० स्वामी सत्यपतिजी
५. ब्रह्म विज्ञान - ले० स्वामी सत्यपतिजी. आचार्य ज्ञानेश्वरजी एवं स्वामी विवेकानन्दजी परिव्राजक (रोजड़)

स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वतीजी रचित "Rajayoga" तथा अन्य चार योग विषयक हिन्दी पुस्तकें (जो आजकल अप्राप्य हैं) भी महत्त्वपूर्ण हैं ।

= भावेश मेरजा

.

.

ॐ..

ॐ..