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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : प्रभु- पावन रस‌

ओ३म् त्वे क्रतुमपि वृजन्ति विश्वे द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमा: ।
स्वादो: स्वादीय: स्वादुना सृजा समद: सुमधु मधुनाभि योधी: ।।साम १४८५ ।।

प्रभु के रस से स्वादिष्ट कौन, सब ही रस इससे फीके हैं ।
जो प्रभुवर से जुड़ जाते हैं, उनके रक्षित रस छींके है ।।

यौवन रस संचित करता है,
तो आत्म सुरक्षित बनता है,
हर स्तर पर होता विकास
वह सर्वनाश से बचता है ।

हो क्रियाशीलता से पवित्र, फल आते शुभ करनी के हैं |
जो प्रभुवर से जुड़ जाते हैं, उनके रक्षित रस छींके हैं ||

बन मधुर मिलन से पति पत्नी,
हो ग‍ई शक्ति अपनी दुगुनी,
सन्तान प्राप्त हो जाने पर
यह शक्ति हुई दुगुनी तिगुनी |

हो बुद्धि शुद्धि के साथ तभी, कृति में व्रत ढ़लते नीके हैं |
जो प्रभुवर से जुड़ जाते हैं, उनके रक्षित रस छींके हैं ||

क्यों उसको जग रस ललचाये,
रस प्रभु का जिसको मिल जाये,
स्वादिष्ट मधुर बल पावन रस
यही सुयोधा जयी बनाये |

तप ज्ञान ध्यान रस सरित सृजे, मृदु सहज मिलें रस छी‍टे हैं |
जो प्रभुवर से जुड़ जाते हैं, उनके रक्षित रस छींके हैं ||

(सामवन्दना कृति पं. देव नारायण भारद्वाज )

शुभेच्छु :

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
चलभाष: 9041342483