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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : वेद गिरा का वर्तन‌

ओ३म् अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे ।
सूनं सत्यस्य सत्पतिम् ।। साम १४८९ ।।

जब मधुर वेद का वाचन हो, सुन कर प्रभु का आकर्षण हो ।
जब वेद गिरा का वर्तन हो, तब वेद नाथ का दर्शन हो ।।

हे प्राणी, तेरी यह वाणी,
इसकी क्षमता प्रबल प्रमाणी,
इस धरा धाम की कौन कहे
प्रभु पास बुला सकती वणी ।

प्रभु इन्द्रपति का वर्णन हो, ऐश्वर्य ज्ञान का अर्चन हो ।
जब वेद गिरा का वर्तन हो, तब वेद नाथ का दर्शन हो ।।

गोपति का गायन कर वाणी,
शुचि ज्ञान ग्रहण करता प्राणी,
हो जाता सत्यासत्य बोध
जीवन बन जाता कल्याणी ।

श्रुति शब्द अधर मन नर्तन हो, नर्तन में सुख सम्वर्द्धन हो ।
जब वेद गिरा का वर्तन हो, तब वेद नाथ का दर्शन हो ।।

जीवन में आये प्रभु वाणी,
तो सज्जन बन जाता प्राणी,
प्रभु प्यार प्रेरणा पाता वह
हो उसकी प्रीति परित्राणी ।

प्रभु गायक विनयी सज्जन हो, तो सत्पति का संरक्षक हो ।
जब वेद गिरा का वर्तन हो, तब वेद नाथ का दर्शन हो ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर

चलभाष : 9041342483