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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

गीतस्तुति (आर्याभिविनय ४ )

ओ३म् अग्नि: पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत |
स देवाँ एह वक्षति | 4 | (ऋग्वेद 1- 1- 1- 2 )

विद्वान पुरातन नूतन, स्तवन गीत सब गायें |
सब ऋषि, मनीषी मानव, गुणगान आपके गायें |

सब सृष्टि पूर्व के ऋषियों ने,
उन आदिसृष्टि के ऋषियों ने
इन वर्तमान के ऋषियों ने

पावन परम प्रशंसा के, श्रुति स्तोत्र आपके गायें |
सब ऋषि मनीषी मानव, गुणगान आपके गायें |

मन्त्रों के दृष्टा होते ऋषि
सत्यार्थ ज्ञान श्रुति पाते ऋषि
शिष्यों को वही लुटाते ऋषि

हम दिव्य शिष्य बन जायें, गुणगान आपके गायें |
सब ऋषि मनीषी मानव, गुणगान आपके गायें |

वैज्ञानिक वृद्ध ब्रह्मचारी
विज्ञ अज्ञ या मूढ़ अनारी
स्तुति तेरी सब को ही प्यारी

हे इष्ट देव परमेश्वर, आनन्द आपके पायें |
सब ऋषि मनीषी मानव, गुणगान आपके गायें |

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
90413 42483

पं.

पं. देवनारायण भारद्वाज उदारमना वेदश्रमी हैं | वैदिक धर्म, दर्शन, स‍स्कृति से आपको अपार लगाव है | आपके द्वारा रचित गीतस्तुति ऋचाओं का पद्दात्मक भाषानुवाद है | महर्षि दयानन्द के आर्याभिविनय पर आधारित है |
इसकी भाषा सरल, सुमधुर तथा हृदयाकर्षक है | वैदिक‌ धर्म के सुधी उपासकों को निश्चित आत्मलाभ होगा अत: अधिक से अधिक आर्यजन भक्ति आनन्द प्राप्त कर सकें, इस वैब साइट की सबको जानकारी दें |

धन्यवाद |

शुभेच्छु :

राजेन्द्र आर्य, संगरूर
9041342483