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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : तुम्हें तुम्हारे गीत‌

ओ३म् यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम्|
प्रशंसन्ति प्रशस्तिभी:||सम १५६५||

हैं कहां हमारे पास गीत, हम जिन से स्तुति कर पाये|
जो गीत गगन में छाये हैं, वे गीत आज हमने गाये||

परमेश्वर को हम चाह रहे,
उनकी आज्ञा निर्वाह रहे,
हमने जो वैभव पाया है
हम उससे पुण्य प्रवाह रहे|

तप त्याग और कुछ दान किया, दीनों के जीवन उमगाये|
जो गीत गगन में छाये हैं, वे गीत आज हमने गाये||

प्रभुवर शुभ कार्य तुम्हारे हैं,
हमने वे कार्य संवारे हैं,
समभाव स्वभाव पनपने से
प्रभु बनते मित्र हमारे हैं।

मित्र मित्र के रहें सहायक, असमय में भी साथ निभायें ।
जो गीत गगन में छाये हैं, वे गीत आज हमने गाये ।।

इस वैभव से अवरोध न हो,
तुम से कहीं विरोध न हो,
यह आय सरक या जाय सरक
इस मैत्री से गतिरोध न हो ।

जिनसे जन जन सुख रंजन हो, प्रभुवर को गीत वही भाये ।
जो गीत गगन में छाये हैं, वे गीत आज हमने गाये ।।

राजेन्द्र आर्य‌