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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: नम्र गिरा की गगरी

ओ३म् उप न‍: सूनवो गिर: श्रृण्वन्त्वमृतस्य ये।
सुमृडीका भवन्तु न: ।।साम १५९५ ।।

यदि वाणी मधुर तुम्हारी हो, जीवन मधुमय हो जायेगा ।
इस जग की तो बात कौन, सुनकर जगपति भी आयेगा ।।

यह अमृत वाणी तुमने दी,
श्रुति सम्मत वाणी तुमने दी,
देती हर समय प्रेरणा है
कल्याणी वाणी तुमने दी ।

वाणी के मधुर प्रसारण से, जीवन रसमय हो जायेगा ।
इस जग की तो बात कौन, सुनकर जगपति भी आयेगा ।।

वाणी सम्पर्क बनाती है,
अविचल अपनत्व बढ़ाती है,
द्वेष हटाकर प्रेम पगाती
प्रभु की आभा विकसाती है ।

स्वर संयम के आकर्षण से, जीवन सुखमय हो जायेगा ।
इस जग की तो बात कौन, सुनकर जगपति भी आयेगा ।।

श्रुति का जिसने रसपान किया,
जो पान किया वह गान किया,
पावन आचरण बना करके
अमृत का विमल निधान किया ।

इस नम्र गिरा की गगरी से, जीवन प्रभुमय हो जायेगा ।
इस जग की तो बात कौन, सुनकर जगपति भी आयेगा ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌

पं.

पं. देवनारायण भारद्वाज जी की अनुपम कृति "सामवन्दना" के मन्त्रों को गीतानुवाद सहित मैंने बड़े परिश्रम और लगन के साथ साम वन्दना प्रकोष्ठ में लिखा है जो अब पूर्णता की ओर अग्रसर है, वेद का प्रचार और प्रसार हो, इसी भावना के साथ मैँने यह प्रयत्न किया है सभी आर्य वेद प्रेमी इस प्रकोष्ठ से लाभ उठाएं, धन्यवाद ।

शुभेच्छु:

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)

90413 42413

email: rajenderarya49@gmail.com

& rajendrap.arya@yahoo.com