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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : प्रभु तुम्हें नमन‌

ओ३म् उप त्वाग्ने दिवे दिवे दोषावस्तर्धिया वयम् |
नमो भरन्त एमसि | ||साम १४ ||

प्रभु तुम्हें नमन प्रभु तुम्हें नमन |
मेरे प्यारे प्रभु तुम्हें नमन ||

मैंने इस दुनिया को देखा |
देखा जड़ चेतन का लेखा |
देखी प्रभु की सर्वत्र देन,
तन मन धन बुद्धि और जीवन ||

तुम्हें तुम्हारा अर्पण कैसा |
अपने पास नहीं कुछ ऐसा |
एक नमन ही अपना ठहरा,
प्रभु तुम्हें समर्पित यही नमन ||

दिन रात नित्य सन्ध्या प्रभात |
मन में मँडराती यही बात |
हर समय नाथ का साथ रहे,
यन माथ नमन में रहे मगन ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌