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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम- श्रद्धा : प्रभु की पताकाएँ

ओ३म् उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव: |
दृशे विश्वाय सूर्यम् || साम ३१ ||

जगत वस्तुयें किरणें प्यारी |
सभी पताका यही तुम्हारी ||

जग पालक श्रुति नियम सितारे |
वन- पर्वत सागर सरिता रे |
पुष्प- सुरभि सी खिली बुद्धियँ,
सब में दिखती झलक तुम्हारी ||

तुम उत्पादक सूर्य- प्रकाशक |
वस्तु वस्तु में रहते व्यापक |
जिधर देखते उधर दिखती,
हमको प्रभुवर ज्योति तुम्हारी ||

हर राह तुम्हीं तक जाती है |
हर ध्वजा राह दिखलाती है |
कदम बढ़ायें हाथ पसारें,
हम पायेंगे गोद तुम्हारी ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌

Submitted by Rajendra P.Arya

Submitted by Rajendra P.Arya on Fri,
2012-03-16 10:31. भजन/कविता
अष्टांग योग साधना :
साधक बनकर करो साधना अमृत का भंडार मिलेगा !
मानव जीवन सफल बनेगा परमेश्वर का प्यार मिलेगा !
साधक बनकर करो साधना ..............................
सत्य अहिंसा को अपनाना ब्रहमचर्य को धारण करना !
चोरी तजना लोभ त्यागना अपने दोष निवारण करना !
परम प्रभु के पवन पथ पर बढ़ने का अधिकार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ...............................
शौच तथा संतोष संवारें तन का चोला मन का दर्पण !
ताप स्वाध्याय निरंतर होवे ईश्वर के प्रति आत्म समर्पण !
याम नियमों का पालन करिये भक्ति को आधार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ..................................
आसन प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ निडर बलवान बनोगे !
करके प्रत्याहार धारणा योगनिष्ठ इंसान बनोगे !
अन्तः करण पवित्र बनेगा शुद्ध सरल व्यवहर मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना .................................
लींन हुए जब ध्यान लगा कर प्रभु-द्वार तक आ
जाओगे !
लगी समाधी मिली सफलता
परम तत्त्व को पा जाओगे !
करो ‘पथिक’ अष्टांग योग फिर समय न बारम्बार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ..................................
प्रेषक :
राजेंद्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
9041342483

Submitted by Rajendra P.Arya

Submitted by Rajendra P.Arya on Fri, 2011-09-23 05:06. साम वन्दना

ओ३म् उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव: |
दृशे विश्वाय सूर्यम् || साम ३१ ||

जगत वस्तुयें किरणें प्यारी |
सभी पताका यही तुम्हारी ||

जग पालक श्रुति नियम सितारे |
वन- पर्वत सागर सरिता रे |
पुष्प- सुरभि सी खिली बुद्धियँ,
सब में दिखती झलक तुम्हारी ||

तुम उत्पादक सूर्य- प्रकाशक |
वस्तु वस्तु में रहते व्यापक |
जिधर देखते उधर दिखती,
हमको प्रभुवर ज्योति तुम्हारी ||

हर राह तुम्हीं तक जाती है |
हर ध्वजा राह दिखलाती है |
कदम बढ़ायें हाथ पसारें,
हम पायेंगे गोद तुम्हारी ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌