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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : केवल प्रभु

ओ३म् इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्य: ।
अस्माकमस्तु केवल: ।। साम १६२० ।।

हमने अति सोच -विचार किया, निष्कर्ष यही बस आया है ।
कोई नहीं जगत में अपना, केवल प्रभु जैसा पाया है ।।

हम सारा विश्व विलोक रहे,
सब देख लोक- परलोक‌ रहे,
प्रभुवर से बढ़कर अन्य नहीं
सर्वत्र वही आलोक रहे ।

यह धरा धाम या स्वर्ग मोक्ष, प्रभुवर हर कहीं रमाया है ।
कोई नहीं जगत में अपना, केवल प्रभु जैसा पाया है ।।

देखा जन और महाजन को,
योगी वैरागी गुरुजन को,
देखे आकर्षक महापुरुष
दानी उपकारी सज्जन को ।

गुण बिन्दु पर्श वे गुणी हुए, प्रभु में गुण सिन्धु समाया है ।
कोई नहीं जगत में अपना, केवल प्रभु जैसा पाया है ।।

प्रभु का ऐश्वर्य झलकता है,
जग में वह मनुज चमकता है,
वह भले प्रेरणा देता हो,
कब उसमें भक्त अटकता है ।

सब गुरुओं का जो गुरुवर है, वह हमने हृदय बसाया है ।
कोई नहीं जगत में अपना, केवल प्रभु जैसा पाया है ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌