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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : आत्म नगरी

ओ३म् स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि ।
अस्मभ्यम् प्रतिष्कुत:।। साम १६२१ ।।

तुम रहते हो तो रहती है, यह देव तुम्हारी नगरी है ।
बिन आत्म देह की यह नगरी, रहती मिट्टी की गठरी है ।।

प्रभु प्रीति आत्म ने पकड़ी है,
उनके ही बल पर अकड़ी है,
जिससे उत्थान तुम्हारा हो
दी देह तुम्हें यह तगड़ी है ।

नित नेह देह से बहुत किया, प्रभुवर की महिमा विसरी है ।
बिन आत्म देह की यह नगरी, रहती मिट्टी की गठरी है।।

जग के रहस्य समझाते हैं,
प्रभु सत्यासत्य बताते हैं,
कुछ मिट्टी की इस ढ़ेरी को
वे तेरी देह बनाते हैं ।

तू देह गेह में रम जाता, तज देता आभा अगरी है ।
बिन आत्म देह की यह नगरी, रहती मिट्टी की गठरी है ।।

परमात्म, आत्म, अथवा शरीर,
लो समझ सार सबका सुधीर,
हो यथायोग्य सत्कार प्यार
मत अपमिश्रित हो नीर क्षीर ।

यह देह आत्म का साधन बन, प्रभु रस की भरती गगरी है ।
बिन आत्म देह की यह नगरी, रहती मिट्टी की गठरी है ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)