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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम- श्रद्धा : शान्ति- पिपासा

ओ३म् शन्नो देवीरभिष्टये आपो भवन्तु पीतये |
शंयोरभिस्रवन्तु न: ||साम ३३ ||

अब शेष विशेष न आशा हो |
दर्शन की शान्त पिपासा हो ||

दिव्यगुणों की देवी माता|
जगत तुम्हीं से सुख रस पाता ||
हमको भी पयपान करा दो,
प्रत्यूषपूर्ण प्रत्याशा हो ||

रवि किरणों में आकर्षन है |
प्रभु के दर्शन का वर्णन है |
प्रभु यही अभीष्ट हमारा है,
बस पूर्ण मिलन अभिलाषा हो ||

जो एक अकेला ही पीता|
वह रहता रीता का रीता |
जब साथ पियें अपने साथी,
सर्वत्र वृष्टि रस भाषा हो ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌