Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : व्यर्थ भार‌

ओ३म् मा नो अग्ने महाधने परावर्ग्भारभृद्दथा ।
संवर्ग सं रयिं जय ।।साम १६५० ।।

जो दिया हमें प्रयाप्त दिया, उपयोग हमें इसका आये ।
हम भार उठाते रहें व्यर्थ, धन अन्य न कोई खा जाये ।।

धनवान कौन प्रभु से महान,
जिसके धन से नभ दीप्तिमान,
प्रभु ने ऐश्वर्य प्रयोग किया
यों हुई धरा मुस्कानवान ।

क्या हमने भी कुछ योग किया, क्या कुछ प्रकाश हम कर पाये ।
हम भार उठाते रहें व्यर्थ, धन अन्य न कोई खा जाये ।।

प्रभु दानी हैं हम संग्राही,
प्रभु स्वामी हम बोझावाही,
प्रभु कुलपति हम रह गए कुली
दो पृथक वर्ग के दो राही ।

मत वर्ग बहिष्कृत करो हमें, प्रभु रखो वर्ग में अपनाये ।
हम भार उठाते रहें व्यर्थ, धन अन्य न कोई खा जाये ।।

संवर्ग तुम्हारा पायेंगे,
तो हम संजय हो जायेंगे,
हर दुर्गुण पर दुर्जय करके
हम धन पर भी जय पायेंगे ।

धन सेवक बन संकेत सुने, जग में शुभ शोभा बिखराये ।
हम भार उठाते रहें व्यर्थ, धन अन्य न कोई खा जाये ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌