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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : श्रेष्ठ सम्पदा

ओ३म् सुमन्मा वस्वी रन्ती सुनरी ।।साम १६५४ ।।

प्रभुवर की श्रेष्ठ सम्पदा से, हमने अपने करतब पागे ।
हमने उत्तम कर्त्तव्य किए, सौभाग्य तभी अपने जागे ।।

तुमने श्रुति का संचार किया,
जग सम्पत्ति का विस्तार किया,
जब किया समन्वय दोनों का
तब हमने जग श्रंगार किया ।

हमने प्रभुवर की आभा से, अपने मन सुन्दर अनुरागे ।
हमने उत्तम कर्त्तव्य किए, सौभाग्य तभी अपने जागे ।।

वसु वस्तु सभी तुम देते हो,
क्या कुछ बदले में लेते हो,
हम बसे वहँ तुम बसे जहाँ
पर भाग न कुछ भी लेते हो ।

आवास न यह अन्तिम निवास, प्रभु साथ मधुर इससे आगे ।
हमने उत्तम कर्त्तव्य किए, सौभाग्य तभी अपने जागे ।।

प्रभु भास भूमि रमणीक यही,
प्रभु ओर गमन गति ठीक वही,
सुमन सुधन हो रमण गमन हो
लो सीख यही तकनीक सही ।

विज्ञान विभ निर्माण करे, जो उषा मनोरम सा लागे ।
हमने उत्तम कर्त्तव्य किए, सौभाग्य तभी अपने जागे ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌