Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : कर्मठ से प्यार‌

ओ३म् गम्भीरां उदधींरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव ।
प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा हृदं कुल्या इवाशत् ।। साम १७२० ।।

वह थोड़ा श्रुति ज्ञान बहुत है, जोकृतियों में ढ़ल जाता है ।
रोज रोज के शुभ कर्मों से, व्यक्तित्व बड़प्पन पाता है ।।

बहु जल राशि अगाध अपारी,
गम्भीर प्रतिष्ठा भी भारी,
पर सागर की प्यास बुझाती,
प्यार लघु नदियां बेचारी ।

नन्हीं नलिकाओं का रस ही, यह हृदय विशाल बनाता है ।
रोज रोज के शुभ कर्मों से, व्यक्तित्व बड़प्पन पाता है ।।

गोपाल पुष्ट बलवान बना,
गो पशुओं के बल खड़ा तना,
धन दुग्धधनी इन् गौ‍ओं का
आधार बना तृण घास घना ।

मानव गोपाल वही उत्तम, तन इन्द्रिय शक्ति प्रदाता है ।
रोज रोज के शुभ कर्मों से, व्यक्तित्व बडप्पन पाता है ।।

लघु दीर्घ कर्म सबका महत्त्व,
प्रभु प्यार दिलाये यह कृतत्व,
कृति ज्ञान ज्ञेय से मिलवाये
अपनत्व दिलाये यही सत्व ।

कर्मठ से करते प्यार सभी, प्रभु भी उसको अपनाता है ।
रोज रोज के शुभ कर्मों से, व्यक्तित्व बड़प्पन पाता है ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर

(सामवन्दना कृति : पं देवनारायण भारद्वाज )