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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : : सोम मैत्री

ओ३म् यो जागार तमृच: कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति ।
यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योका: ।। साम १८२६ ।।

क्या तुमने इनको पहिचाना, ये कौन तुम्हारे घर आये ।
मित्रता तुम्हारी पाने को, प्रभु सोम स्वयं चलकर आये ।।

जो जगता और जगाता है,
जग में प्रकाश फैलाता है,
उन्हें चाहती पुण्य ऋचायें
जो ज्ञान धर्म अपनाता है ।

अपने विवेक बल संबल से, जो करता अद्भुत रचनायें ।
मित्रता तुम्हारी पाने को, प्रभु सोम स्वयं चलकर आये ।।

जो जगता रचना करता है,
हर गर्व घृणा से बचता है,
साम कामना करता उसकी
जो जगत शान्ति से भरता है ।

जो करें जगत को सुख सुन्दर, मधु छन्द गीत उसके गाये ।
मित्रता तुम्हारी पाने को, प्रभु सोम स्वयं चलकर आये ।।

जो जगता व्यसनों से बचता,
बल वीर्य तेज उसका बढ़ता,
रहे हर समय सावधान जो
उससे सोम मित्रता करता ।

तन सोम भव्यतादायक है, प्रभु सोम आत्म यश चमकाये ।
मित्रता तुम्हारी पाने को, प्रभु सोम स्वयं चलकर आये ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌