Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना : शान्ति शक्ति

ओ३म् अग्निर्जागार तमृच: कामयन्ते$ग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति ।
अग्निर्जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योका:।।साम १८२७।।

वेद साम ऋग्वेद ऋचायें, शान्ति शक्ति का पाठ पढ़ायें ।
शक्ति शान्ति से शान्ति शक्ति से, एक दूसरे को विकसायें ।।

अग्नि जाग कर जगत जगाये,
सबको इच्छित ज्ञान कराये,
यह ज्ञान क्रिया में प्रस्तुत कर
जग के सब निर्माण कराये ।

जीवित जागृत अग्नि पुरुष की, सदा कामना करें ऋचायें ।
शक्ति शान्ति से शान्ति शक्ति से, एक दूसरे को विकसायें ।।

यह अग्नि अंकुरण करती है,
वाटिका इसी से खिलती है,
रम्य सुगन्धित शान्ति सुमन दे
यह नित्य नमन यश वरती है ।

मधुर मनोहर शान्त पुरुष की, साम कामना कर गुण गायें ।
शक्ति शान्ति से शान्ति शक्ति से, एक दूसरे को विकसायें ।।

ओज अग्नि का जिसने पाला,
सोम हुआ उसका मतवाला,
परमेश प्यार या वीर्य सार
बने उसी का सखा निराला ।

ज्ञान कर्म से भक्ति प्रवाहे, उससे मैत्री सोम निभायें ।
शक्ति शान्ति से शान्ति शक्ति से, एक दूसरे को विकसायें ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌