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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: नायक सहगामी

ओ३म् नम: सखिभ्य: पूर्वसभ्दयो नम: साकं निषेभ्य: युञ्जे वाचं शतपदीम् ।।साम १८२८ ।।

जो हम से आगे निकल गये, वे सखा बन गये तारे हैं ।
जो नित्य हमारे साथ रहें, वे भी तो अतिशय प्यारे हैं ।।

हम खेले मिट्टी मे पकड़ हाथ,
सब पर्व मनाये साथ साथ,
हम पढ़े लिखे बन सहपाठी
पर खिले किसी के दिव्य साथ।

वे हुए हमारे महापुरुष, दे रहे हमें उजियारे हैं ।
जो नित्य हमारे साथ रहें, वे भी तो अतिशय प्यारे हैं ।।

इनसे जग का उद्दान खिला,
हमको भी गौरव मान मिला,
इनके शत शत व्याख्यानों से
हमको उत्साह महान मिला ।

ले नमन हमारा वे नायक, जो प्रभु का सुयश संवारे हैं ।
जो नित्य हमारे साथ रहें, वे भी तो अतिशय प्यारे हैं ।।

हम जिनके साथ विचरते हैं,
व्यवहार परस्पर करते हैं,
निज शत शत क्रिया कलापों में
प्रभु वाणी का बल भरते हैं ।

ले नमन हमारा सहगामी, सुख दु:ख में साथ हमारे हैं ।
जो नित्य हमारे साथ रहें, वे भी तो अतिशय प्यारे हैं ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
चलभाष: 09041342483