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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: जागृत- ज्योति

ओ३म् अग्निर्ज्योतिरग्निरिन्द्रो ज्योतिर्ज्योतिरिन्द्र: ।
सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: ।।साम १८३१ ।।

सर्वत्र प्रकट हो ज्योति शिखा, प्रत्यक्ष कार्य कर देती है ।
हर ज्योति जगत में जागृत हो, आभास जनक का देती है ।।

पृथ्वी में अग्नि समायी है,
पर देती नहीं दिखायी है,
जब पत्थर में घर्षण होता है
तब लेती यह अँगड़ाई है ।

हो प्रकट काष्ठ में अग्नि ज्योति, बनकर ज्वाला उठ लेती है ।
हर ज्योति जगत में जागृत हो, आभास जनक का देती है ।।

अन्तरिक्ष में विद्दुत रहती,
किन्तु नहीं वह हमको दिखती,
जब मेघों में घर्षण होता
तीव्र चमक दे वही गरजती ।

ताम्र तार में गुप्त चाल से, सब चमत्कार कर देती है ।
हर ज्योति जगत में जागृत हो, आभास जनक का देती है ।।

सूर्य लोक की ज्योति निराली,
सप्तवर्ण के किरणों वाली,
निशा हटाती सृजन जगाती
संसृति सारी जिसने पाली ।

तन- हृदय -बुद्धि प्रभु अग्नि शुद्धि, जग ज्योतिर्मय कर देती है ।
हर ज्योति जगत में जागृत हो, आभास जनक का देती है ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌