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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सामवन्दना: अंग- अंग सुमंगल‌

ओ३म् भद्रं कर्णेभि: श्रणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षिभिर्यजत्रा: ।
स्थरैर्ङस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु: ।। साम १८७४ ।।

तुम रहते हो साथ हमारे, हम रहें तुम्हारे संग- संग ।
हे नाथ करो अब अनुकम्पा, भर जाय सुमंगल अंग- अंग ।।

हे देवेश्वर है विनय यही,
जगदिश बनो अब सदय सही,
सब यज्ञ यजन कर्त्ताओं को
दो शक्ति सफलता विजय यही ।

यह तुमने देह प्रदान करी, हो जाय नहीं ये रंग- भंग ।
हे नाथ करो अब अनुकम्पा, भर जाय सुमंगल अंग- अंग ।।

सुने कौन कल्याण सर्वदा,
हो नयन दृष्टि कल्याणप्रदा,
प्रत्येक अंग आभास करे
तेरी महिमा का गान सदा ।

बलवान बने तन का वितान, हो जाय नहीं ये तंग- तंग ।
हे नाथ करो अब अनुकम्पा, भर जाय सुमंगल अंग- अंग ।।

हम करें तुम्हारा गुण गायन,
आदेश तुम्हारा कर पालन,
यह आयु देवहित अर्पित हो
तन करे आत्म सुख का धारण ।

हो तन तरंग मन में उमंग, हो जाय दमन हर दंग- जंग ।
हे नाथ करो अब अनुकम्पा, भर जाय सुमंगल अंग- अंग ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
09041342483

सभी आर्य

सभी आर्य बन्धुओं से निवेदन है साम वन्दना में प्रस्तुत सभी मन्त्रों का गीतानुवाद अवश्य पाठ करते रहें जीवन में आनन्द रस भर जायेगा ।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
09041342483