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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : प्रभु काव्य प‍. देव नारायण भारद्वाज रचित‌

ओ3म् अन्ति सन्तं न जहाति अन्ति सन्तं न पश्यति ।
देवस्य पश्य काव्यं न ममाऱ न जिवति । ।।अथर्व 10.8.32 ।।

हर नर वचार कर हारा है ।
प्रभु अद्भुत काव्य तुम्हारा है ।।

वह पास तुम्हारे रहता है ।
जो कभी न तुमको तजता है ।
इस सृष्टि काव्य निर्माता को,
क्या तुमने कभी निहारा है ।।

प्रभु हर क्षण तुम्हें देखता है ।
हर क्रिया कलाप परखता है ।
तुम उसको नहीं देख पाते ।
बस रहा जगत में प्यारा है ।।

रे देख देख प्रभु काव्य देख ।
प्रभु काव्य भव्य सम्भाव्य देख ।
मरे नहीं यह नहीं जीर्ण हो ।
आनन्द अतुल रस धारा है ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌