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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

शरीर में माता , काली अथवा हनुमान का आना |

एक बार ऐसी घटना के बारे में एक परिचित ने बताया था की एक स्थान पर एक औरत काफी लोगो की भीड़ में माता आने का नाटक सा कर रही थी … लोग भी भजन गा रहे थे और ढोल आदि पीट रहे थे ….
तभी एक समझदार व्यक्ति वहां से गुज़रा.. वो सीधा भीड़ को चीरता हुआ उस औरत के पास पहुंच गया और बोला “हांजी माताजी प्रणाम ! जरा बताइए तो कोंसी माता आई है आपके शरीर में ?”
तो वो उसी प्रकार से झटके ले कर बोली “वैष्णो देवी .. वैष्णो !!” … इतने में वो सज्जन बोले की “अरे वाह ये तो अति उत्तम हुआ , मैं तो अभी वैष्णो देवी से ही आ रहा हूँ !! वहां पर माता को प्रसाद भी लगा कर आया हूँ ! चलिए बताइए आपको किस चीज़ का भोग लगा कर आया हूँ ? बर्फी का या हलवे का ??” !! उनकी इतनी सी बात से वो पाखण्डन जो वहां पैसे इकट्टे कर रही थी निरुत्तर हो गयी ||
जो सभी लोग असे हो तो भारत में फिर सिर्फ वैदिक धर्म की पताका लहराएगी |

ऐसा नहीं है की सभी लोग जो ऐसा अनुभव करते है की माता आगयी वो पाखंड ह करते या जान मूझ्कर ही करते है , परन्तु दिमागी शक्ति कमजोर होने के कारण, अति भावुक होने के कारण भी कुछ लोग औरो को देखा देखि ऐसा अनुभव करने लगते हैं की माता आगयी या श्याम बाबा आ गये हैं || लेकिन ये केवल और केवल मानसिक कमजोरी ही है |
क्यूंकि अन्यथा भगवान् का आना तो अच्छी बात है, फिर लोग क्यों शीघ्र जिन लोगो में माता अथवा श्याम बाबा आते हैं उनको मंदिर लेजा कर इसे दूर करने को कहते है ?? क्यों नहीं लोग इच्छा करते की घर के सब सदस्यों में माता आये ? क्यों माता का आने पर लोग घबराते है ? ऐसा स्पष्ट समझना चाहिए की ये एक प्रकार का मानसिक रोग ही है ... जिसका निराकरण भी इसी प्रकार कर लिया जाता हा की उस व्यक्ति या औरत को माता के किसी मंदिर में लेजा कर माता टेकवा कर ऐसा विश्वास दिला दिया जाता है की अब माता निकल गयी है और तुम ठीक हो जाओगे... और जी वो व्यक्ति / औरत ठीक भी महसूस करता है |
इसका स्पष्टीकरण "भूल -भुलैय्या " नामक फिल्म में भी दिखाया गया है ... जो अवश्य देखने योग्य है | की कैसे उसमे एक लड़की एक नर्तकी की दुखभरी कथा को इतने भावनात्मक तरीके से पढ़ती है की स्वयं को उसके साथ जूडा हुआ महसूस करती है , और अंत में उसी की तरह व्यवहार भी करने लगती है .. जबकि गावं वाले समझते है उस लड़की में नर्तकी की आत्मा आ गयी है |