Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बिन्दु बुन्दु बोध (प्रणेता: देवनारायण भारद्वाज)

ओ3म् स्त्रोत्रं राधानां पते निर्वाहो वीर यस्यते |
विभूतिरस्तु सूनृता | ऋ.१|२|२८|५ ||

करो नमन राधापति परमेश्वर को |

जो सुख सिद्धि वृद्धि की वस्तुएं सभी |
वे कहलाती राधा वस्तुएं सभी |

पायें दुखनाशक वस्तु वरेश्वर को |
करो नमन राधा पति परमेश्वर को |

हम सुन्दर श्रेष्ठ वस्तुएं पा जायें |
पाकर राधा बाधायें हट जायें |

राधा प्रेमी पति नमन वरेश्वर को |
करो नमन राधा पति परमेश्वर को |

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
9041342483

वेद

वेद गरिमा:

हम उस देश के बालक हैं, जिस देश में श्रुति माँ रहती है |
हम उस वेद के पाठी हैं, जिस वेद में गरिमा रहती है ||

यह आर्यावर्त्त हमारा है, या भारतवर्ष हमारा है |
सम्पूर्ण विश्व में बढ़ चढ़ के, हमको प्राणों से प्यारा है |
हिमगिरि की ऊंचाई वाला, सागर की गहराई वाला |
नदियों का ओज धमनियों में, गङा यमुना अंगनाई वाला |

हम उस भूमि के अंकुर हैं, जिस भूमि में अणिमा रहती है |
हम उस वेद के पाठी हैं, जिस वेद में गरिमा रहती है |

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌