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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : श्रुति श्रद्धे (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज )

ओ३म् श्रद्धयाग्नि: समिध्यते श्रद्धया हूयते हवि: ।
श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि । ।।ऋ १०.१५१.१ ।।

अभ्युदय पन्थ दिखलाती हो ।
हे श्रद्धे, जब आ जाती हो ।।

अग्नि प्रज्वलित करती श्रद्धे ।
हवि अर्पण भी करती श्रद्धे ।
यज्ञ सृजन तुम से ही होते,
श्रद्धे उत्साह बढ़ाती हो ।।

व्रत लक्ष्य सुझाती सब श्रद्धे ।
अभियान चलाती सब श्रद्धे ।
निज ध्येय धर्म हित तरुणों से,
श्रद्धे, बलिदान कराती हो ।।

श्रुतिवाणी उमगाती श्रद्धे ।
मूर्धन्य बनाती श्रुति श्रद्धे ।
ऐश्वर्य ज्ञान सौभाग्य सर्व,
उपलब्धि शीर्ष सुख लाती हो ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌

हितोपदेश

हितोपदेश (हिन्दी मासिक) का अंक "सुभँकरणी" रचनाकार: देवातिथि: देवनारायण भारद्वाज और जिसके सम्पादक आचार्य महेशचन्द्र गर्ग, शिक्षक नगर, सासनी (हाथरस) हैं । मुझे अभी सप्रेम भेजी गयी है जिसमें स्वस्ति वाचन एवंशान्तिकरणम् मन्त्रों एवं अन्य वेद मन्त्रों का गीतानुवाद बहुत ही उत्कृष्ट है । इतना अच्छा गीतानुवाद मैंने पहले कभी नहीं देखा, जीवन में ब्रह्म रस की धारा बहने लगती है मस्ती छा जाती है बहुत आनन्दवर्द्धक है ।
मैं पं देवनारायण भारद्वाज जी का अति आभारी हूँ
धन्यवाद

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
09041342483