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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : साम गान (पं. देवनारायण भारद्वाज रचित )

ओ३म् इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् ।
ब्रह्मकृते विपस्चिते पनस्यवे ।।साम ३८८ ।।

बसा तुम्हारा नाम साम में ।
मिलता है आराम नाम में ।।

हे आत्म साम का गान करो ।
सद् बुद्धि सृजित विज्ञान कऱो ।।
बृहत् साम के मधुर गान से,
होता सुख अभिराम धाम में ।।

प्रभु नाम वेद विख्याता है ।
श्रुति ज्ञान बुद्धि का दाता है ।।
प्रिय पूज्य ईश गुण गायन से,
मिलता सुख निष्काम काम में ।।

ज्योति ज्योति से जलती जाती
शक्ति भक्ति से मिलती जती ।।
प्रभु- नाम- काम सुखधाम बना,
सुख छाया परिणाम धाम में ।।

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483