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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बिन्दु बिन्दु बोध (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ३म्

बढ़ता दूरी से नेह नवल,
जो न्यून निकटता से होता ।
अति दूर न हो अति निकट न हो,
मर्यादा में ही सुख होता ।।

परिचित स्वजनों से वैर न कर,
यह वैर क्रोध को लाता है ।
यह क्रोध करे कुल का विनाश,
इतिहास यही बतलाता है ।।

**गुणवान गुणी से सुख लेता,
ले सकता वह निर्गुणियों से ।
गुणहीन किन्तु दुर्भागी है,
ले सकें न ये गुण गुणियों से ।।

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य‌