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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : वेद की मेधा (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ३म् अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह ।
अहं सूर्य इवाजनि । ।।साम १५२ ।।

सूरज एक गगन में छाया ।
मैं सूरज धरती का जाया ।।

सूरज अपना तेज लुटाता ।
मैं जग में मुस्कान लुटाता ।
सूर्य मेघ से जल बरसाये,
मैंने भू अंकुर उपजाया ।।

सूरज में प्रभु का प्रकाश है ।
मुझ में भी उसका विकास है ।
सत्य वेद की मेधा देकर,
हमें पिता ने सूर्य बनाया ।।

प्रभुवर प्यारे पिता हमारे ।
दोनों के हैं वही सहारे ।
सूर्य सृष्टि में किरन लुटाता,
मं ने भी जग मगन बनाया ।।

प्रेषक:

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483

आदरणीय पं.

आदरणीय पं. देवनारायण भारद्वाज जी वेद मन्त्रों का सुन्दर काव्यानुवाद कर श्रँगारित करके वेद के श्रद्धालुजनों को ब्रह्म रस प्रदान करके श्रुति आनन्द प्राप्त करवाने का महान उपकार कर रहे हैं धन्यवाद ।

राजेन्द्र आर्य‌