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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्रणेता: मा. धर्मवीरजी, जे.पी.कालोनी, संगरूर‌

ओ३म् तप: |ओ३म् तप: पुनातु पादयो |

आग में पड़कर भी सोने की दमक जाती नहीं,
काट देने पर भी हीरे की चमक जाती नहीं |
सिल पे घिस देने से भी, जाती नहीं चन्दन की बू,
फूल को मिट्टी में मिला कर भी महक जाती नहीं |
रंज में आता नहीं नेकों की पेशानि पे बल,
धूप की तेजी में भी सब्जे की लहक जाती नहीं |

अन्य
देखकर जो सख़्त तकलीफों को घबराते नहीं,
काम कित्ना ही कठिन हो, पर जो अकुलाते नहीं|
भाग्य पर रहके जो पीछे में पछताते नहीं,
भीड़ पड़ने पर भी चंचलता जो दिखलाते नहीं,
होते हैं इक आन में उनके समागम सब भले
सब जगह सब काम में रहते हैं वे फूले फले ||

(मास्टर धर्मवीर जी की डायरी से साभार)