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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

डायरी संकलन: मा. धर्मवीरजी, जे.पी. कालोनी, संगरूर‌

ध्यान अवस्था : ध्यान ही आत्मा का भोजन है आत्मा इन्द्रियों में
जकड़ा है मन से बन्धा है | इन्द्रियों के बन्धन से मुक्त होकर मन
जब आत्मा की ओर देखता है तो मनुश्य ध्यान अवस्था में
पहुँचता है |
मन का इन्द्रियों के विषय विकार से परे हट जाना ध्यान है
ध्यान सिन्धु मुक्ता घने जो खोजे सो पाय,
चंचलता मन की मिटै सहज शान्ति मिल जाय ||

अन्य:
आयुर्वेदशास्त्रानुसार्:

5 वर्ष की आयु तक शिशु
5 से 12 " " "" बालकपन, लड़कपन
12 से 25 " " " विद्दार्थी
25 से 40 " " " त‌रुणाई
40 से 85 " " " युवावस्था
85 से 110 " " " वृद्धावस्था
110 से 120 " " " जरावस्था

श्री धरमवीर, 102, जे पी कालोनी, संगरूर की
डायरी से संकलित
राजेन्द्र आर्य
9041342483
01672 239387

त्रिविद्द

त्रिविद्दा :

Being Becoming Bliss

सत् चित्त आनन्द

भू:(बीज) भुव:(वृक्ष) स्व:(फल)

बीज कभी नष्ट नहीं होता|

ईश्वर = सविता = प्रेरणा करने वाला