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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Maharshi Manu's advice

In Satyarth-Prakash, Maharshi Dayananda Saraswati has
quoted a below given shloka from Manusmriti:

नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः |
जानन्नपि हि मेधावी जड़वल्लोक आचरेत ||
(मनुस्मृति अध्याय २)

अर्थ:
"कभी बिना पूछे वा अन्याय से पूछने वाले को कि जो कपट से पूछता हो, उसको उत्तर न देवे | उनके सामने बुद्धिमान जड़ के समान रहे | हां, जो निष्कपट और जिज्ञासु हों, उनको बिना पूछे भी उपदेश करे |"

Meaning:
"Let a wise man never speak unless spoken to, nor answer a question when unjustly and hypocritically asked. Among hypocrites let him remain as if he were dumb; but to the honest truth-seeker let him preach even though unasked."

Bhavesh Merja

बहुत सही

बहुत सही प्रेरणा है । मेरे जैसे निष्कपट और जिज्ञासु को उपदेश की अति आवश्यकता है, मुझे स्वाध्याय की भूख बहुत लगी रहती है । धन्यवाद भावेशजी ।

राजेन्द्र आर्य‌

नमस्कार

नमस्कार माननीय श्री भावेश मेरजा जी,
आपने बहुत ही यथार्थ परिस्थिति का द्र्ष्टान्त दिया है जो हम सभी के रोजिँदा जीवन मे साहजिक‌ अनुभव सा है, हमेशा सच्चे उपदेश का हकदार निष्कपट मनुष्य ही होता है | यह पुरे मुद्दे का विस्तरुत‌ वर्णन आप ही के द्वारा अनुवादित गुजराती भाषा मे प्रकाशित उत्तम पुस्तक "योग दर्शन‌" मे किया हुआ है जिस‌ का आजकाल मे अध्ययन‌ कर रहा हूँ, जो उत्क्रुष्ट पुस्तक माननीय श्री व्याख्याकार स्वामी सत्यपति परिव्राजक रचित है । महर्षि पतँजलि ने भी योग सूत्र मे आप्त मनुष्योँ के सँग का महिमा दर्शाया है जो योग मे साधक को मददरुप बनता है और मिथ्याग्यानि मनुष्यो के साथ चर्चा चित्त की कलिष्ट वरुत्ति जैसे की विपर्यय वरुत्ति को प्रेरणा देने समान है|

आर्य‌ भावेश मेरजा जी, अपनी मातरुभाषा मे पुस्तक वाँचने का आनँद हि कुछ और है, उपराँत योग दर्शन जैसे महा आर्ष‌ ग्रन्थ को आपकी क्रुपा से गुजराती मेँ पाकर बहुत हि रोमाँचित हूँ | बहुत हि धन्यवाद |

‍‍‍‍‍ ‍‍ कुशल आर्य

धन्यवाद

धन्यवाद कुशल जी
भावेश