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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : अर्चना करो

ओ३म् अर्चन्त्यर्क मरुत: स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्र: । ।।साम ४४५।।

नित मन्त्र सुनाओ नये नये ।
जग यज्ञ रचाओ नये नये ।।

प्रभु ने जो मन्त्र सुनाये हैं ।
वे हमने जी भर गाये हैं ।
मृदु मन्त्र भाव निर्देशन से,
कर्त्तव्य निभाओ नये नये ।।

प्रभु की पहिचान बताई है ।
वेदों ने महिमा गाई है ।
बलवती इन्द्र तरुणाई से,
निर्माण सजाओ नये नये ।।

हे युवा उठो अर्चना करो ।
बलवान बनो वन्दना करो ।
प्रभु गुण गायन अनुपालन से,
कल्याण बढ़ाओ नये नये ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌