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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : बन्धन मुक्ति

ओ३म् उदित्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमंश्रथाय ।
अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम ।।साम ५८९।।

व्रत पालन की दृढ़ता लायें ।
बन्ध हमारे खुलते जायें ।।

ज्ञान इन्द्रियों के अभिनन्दन ।
कीर्ति कामना उत्तम बन्धन ।
संकल्प साधना के द्वारा,
इनसे हम ऊपर उठ जायें ।।

हृदय भावना के अवगुंठन ।
देह धारणा मध्यम बन्धन ।
सौन्दर्य स्वाद की सीमायें,
ये सभी शिथिल होती जायें ।।

काम वासना अति अनाचार ।
यह घृणित अधम बन्धन अपार ।
दुरित ग्रन्थियाँ हीन हमारी,
सभी नाथ ये खुलती जायें ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌