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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : वेद का वरदान‌

ओ३म् त्वमेतदधारय: कृष्णासु रोहिणीषु च |
परुष्णिषु रुशत्पय: | ||साम ५९५ ||

वरदान वेद का पा जाओ |
सब को रसपान करा जाओ ||

अन्धकार आडम्बर छाया |
जिनमें है पाखण्ड समाया |
दिशा विहीन स्वार्थी दम्भी,
तमोगुणी के तमस हटाओ ||

सतोगुणी प्रभु जन के प्यारे |
मनुज योनि के दीप्त सितारे |
अपने गुण आदर्श सुयश से,
अध: पतन से इन्हें बचाओ ||

रजोगुणी वासना संक्रमित |
जो कुटिल चाल में रहें भ्रमित |
सदाचार पुरुषार्थ सार की,
इन्हें तपस की राह दिखाओ ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌