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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : पुरोहित‌

ओ३म् अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।
होतारं रत्नधातमम् । ।।साम ६०५ ।।

करता वही जगत विस्तारा ।
एक हमारा ईश्वर प्यारा ।।

प्रभा, रूप, गति, ताप सभी है ।
प्रभु में निहित प्रताप सभी है ।
कुशल पन्थ हमको दिखलाता,
वही हमारा पुरोहित न्यारा ।।

सृष्टि यज्ञ का वही रचयिता ।
भरता रंग निराले सविता ।
ऋत्विज विविधता ऋतुएं लाकर,
करता प्रभु नभ में उजियारा ।।

वही हमारा ईश्वर होता ।
यजमानों के यज्ञ संजोता ।
ज्योतोर्मय ऐश्वर्य रत्न सब,
ईश्वर ने जगभर को वारा ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483