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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : मोहयामिनी

ओ३म् आ प्रगाद्‍भद्रा युवतिरह्न: कितुंत्समीर्त्सति ।
अभूद्‍भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री । ।।साम ६०८ ।।

अरे कामना कैसी आई ।
मोहयामिनी को ले आई ।।

प्रभु से हमको विलग किया है ।
जग के सुख में भ्रमित किया है ।
कर दिये भंग सब भद्रभाव,
ली इस ने ऐसी अँगड़ाई ।।

यह किरणों को हर लेती है ।
शुभ दिवस न होने देती है ।
यह निशा तिमिर में भटकाती,
दुर्गति से भरती अँगनाई ।।

यह युवती प्रभु ऐसी कर दो ।
इसमें भाव सात्विक भर दो ।
यह भले हमारे साथ रहे,
हो नहीं ईश से बिगड़ाई ।।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483

पं.

पं. देवनारायण भारद्वाज रचित साम श्रद्धा में साम वेद के मन्त्रों का गीत अनुवाद इतना सुन्दर है मानो वेद के मन्त्रों को गीत की माला पहना कर श्रङार किया गया हो बार बार इन गीतों को गाकर वेद का प्रेमी भक्ति में मस्त हो जाता है । अत: वेद के सभी श्रद्धालुजन भक्ति के रस मे रम जायें इसी भावना के साथ मैं साम वन्दना प्रकोष्ठ में ये मन्त्र लिख रहा हुँ । धन्यवाद ।

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
90413 42483