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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम- श्रद्धा : मनुज- मनीषा

ओ३म् त्वमग्ने यज्ञानां होता वेश्वेषां हित: ।
देवेभिर्मानुषे जने ।। साम १४७४ ।।

मानवीय मन्तव्य बनाओ ।
मनुज मनीषा दिव्य बनाओ ।।

तुम्हीं अग्नि हो यज्ञ तुम्हीं हो ।
ज्ञान ज्ञेय सर्वज्ञ तुम्हीं हो ।
तुम होता विश्व विधाता हो,
भाव हमारे भव्य बनाओ ।।

यज्ञ रचाते विश्व सजाते ।
जग भर में हित हव्य बढ़ाते ।
अपने अनुपम‌ अलंकार से,
मनुज हव्य सुख नव्य बनाओ ।।

जो जगत यज्ञ आयोजक हैं ।
शुभ कर्मों के संयोजक हैं ।
उनकी उपकार साधना से,
हर्ष वर्ष हृद द्रव्य बनाओ ।।

राजेन्द्र आर्य
9041342483
संगरूर‌