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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

योगेश्वर श्री कृष्ण : तुम और हम (प्रो. उत्तम चन्द शरर)

प्रोफैसर उत्तम चन्द शरर जन्माष्टमि पर सुनाया करते थे:

तुम और हम

हम कहते हैं आदर्श था इन्सान था मोहन |
तुम कहते हो अवतार था, भगवान था मोहन ||

हम कहते हैं कि कृष्ण था पैगम्बरो हादी |
तुम कहते हो कपड़ों के चुराने का था आदि ||

हम कहते हैं जां योग पे शैदाई थी उसकी |
तुम कहते हो कुब्जा से शनासाई थी उसकी ||

हम कहते है सत्यधर्मी था गीता का रचैया |
तुम साफ सुनाते हो कि चोर था कन्हैया ||

हम रास रचाने में खुदायी ही न समझे |
तुम रास रचाने में बुराई ही न समझे ||

इन्साफ से कहना कि वह इन्सान है अच्छा |
या पाप में डूबा हुआ भगवान है अच्छा ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर‌

भगवान हम

भगवान हम जिसे चाहे मानें, जैसा चाहें मानें, लेकिन इतना तो अवश्य विचारें कि भगवान के इस रूप में हमें क्या मिलेगा और वह किस प्रकार से मिलेगा | हम चाहते हैं कि हमें कहीं भी भय न लगे, कहीं पर भी हमें उसका आधार उपलब्ध हो जिसके सहारे हम निर्भय हो विचर सकें, तो यह तो केवल तभी सम्भव होगा जब हम ऐसे प्रभु को जानें जो कण कण में व्याप्त‌ है | यदि हम ऐसे भगवान के जो सर्वत्र विराजमान है, जो हमारे भीतर व बाहर है दर्शन‌ कर सकते हैं तभी तो भगवान का मानना लाभकारी है, अन्यथा तो वह केवल मृगतृष्णा का जनक भर ही है |
यह शरर जी की कविता हमें भगवान कृष्ण में भगवान के सही रूप के दर्शन की राह बताती है | वह भगवान जो सब में व्याप्त है, कण कण में व्याप्त है |

धन्यवाद आचार्य जी, पुरानी लेकिन फिर भी तरोताजा कविता को पेश कर आपने हमें कृतार्थ कर दिया |

आनन्द‌