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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : शान्ति पिपासा (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ3म् शन्नो देवीरभिष्टये आपो भवन्ति पीतये |
शंयोरभि स्त्रवन्तु | ||साम ३३ ||

अब् शेष विशेष न आशा हो |
दर्शन की शान्त पिपासा हो ||

दिव्यगुणों की देवी माता |
जगत तुम्हीं से सुखरस पाता |
हमको भी पयपान करा दो,
प्रत्युषपूर्ण प्रत्याशा हो ||

रवि किरणों में आकर्षण‌ है |
प्रभु के दर्शन का वर्षन है |
प्रभु यही अभीष्ट हमारा है,
बस पूर्ण मिलन अभिलाषा हो ||

जो एक अकेला ही पीता |
वह रहता रीता का रीता |
जब साथ पियें अपने साथी,
सर्वत्र वष्टि रस भाषा हो ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
9041342483