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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बोध रत्नमाला : त्रयी बोध की माला (पं. देव नारायण भारद्वाज रचित)

ईश्वर, जीव प्रकृति वाला, यह जीवन दर्शन आला ||
सारा जग खाने वाला, पर एक खिलाने वाला ||

१. एक वृक्ष की एक डाल पर
दो सुन्दर पक्षी रहते हैं |
दोनों ही मित्र मनोहर वे
आलिंगन करते रहते हैं |
खा रहा स्वाद के साथ एक
निशिदिन तरुवर के मीठे फल |
किन्तु दूसरा बिन खाये ही
है देख रहा उसको निश्चल |

है कौन भोगने वाला, है कौन देखने वाला |
सारा जग खाने वाला, पर एक खिलाने वाला ||

२. ब्रह्म जीव दोनों ही चेतन
व्यापक व्याप्य भाव से रहते |
है एक तीसरी भी संज्ञा
जड़ प्रकृति मिलाये ये रहते |
गुण कर्म स्वभाव सभी इनके
अनादि अनन्त से अविचल हैं |
हो प्रकृति प्रलय में छिन्न भिन्न,
गुण मिलें मूल में अविकल हैं |

सत रज तम की यह माला, गुण मूल प्रकृति की यह शाला |
सारा जग खाने वाला, पर एक खिलाने वाला ||

३. जग के जो पाप पुण्य फल हैं
सब जीव भोगते उनको हैं |
कुछ नहीं भोगता परमेश्वर
उनके फल देता उनकौ है |
इस्श्वर से जीव, जीव प्रभु से
दोनों से पृथक प्रकृति डाली |
व्यापक प्रकाश की सत्ता से
यह ईश्वर ने संसृति पाली |

ऋषियों ने परखा भाला, यह त्रैतवाद उजियाला |
सारा जग खाने वाला, पर एक खिलाने वाला ||

ओ३म् द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते |
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वच्यनश्नान्नन्यो
अभिचाकशीति || ऋ.मं१ सू.१६४ मं. २०