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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : स्वर्गभूमि (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ३म् इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिर: |
अर्कमर्चन्तु कारव: ||साम ७२२||

जिनको कर्म कुशलता आती |
प्रभु की पूजा उन्हें सुहाती ||

वाणी में सत्य निखरता हो |
माधुर्य साथ में घुलता हो |
जो जियें सुगढ़ता साथ लिये,
उनकी पुकार प्रभु तक जाती ||

हर कृत्य बना लालित्य प्रदा |
नित नृत्य गीत साहित्य सदा |
जो सदगुण के संग्राहक हैं,
प्रभु की कृपा उन्हें मिल जाती ||

जो जग को सुखद बनाते हैं |
जो हँसते और हँसाते हैं |
जो स्वर्ग भूमि पर ला सकते,
यह धरा उन्हीं के गुण गाती ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483

आदरणीय

आदरणीय आचार्य जी

यह् कविता अतीव सुन्दर है | यह स्वर्ण अक्षरों में लिखी जानी चाहिये |
आपका अतीव धन्यवाद !

आनन्द‌