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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साम श्रद्धा : सोम धाराएँ (प्रणेता: पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ३म् स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया |
इन्द्राय पातवे सुत: ||साम ६८९||

शक्ति भक्ति जो नित्य‌ बढ़ायें |
वे पियें सोम की धारायें ||

तन का सत्व सोम कहलाये |
मन की भक्ति सोम कहलाये ||
इन्द्र वही बन पाते जग में
जो विजय इन्द्रियों पर पायें ||

स्वाद सोम का महा मनोरम |
मदमस्त बनाता अन्तर्तम |
दुर्गति दुरित दूर हो जायें |
जीवन धन पावन हो जायें ||

संयमित श्वाँस जो जीते हैं |
वे स्वरस सोम का पीते हैं |
धीर वीर हों तन मन जिनके
उनमें सोम झलकते आयें ||

राजेन्द्र आर्य
संगरूर
9041342483