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गीत स्तुति (१) | Aryasamaj
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

गीत स्तुति (१)

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ओ३म् शंनो मित्र: शं वरुण: शं नो भवत्वर्य्यमा |
शं न इन्द्रो बृहस्पति: शं नो विष्णुरुरुक्रम: ||ऋग्वेद १|६|१८|८ ||

पाया गुरु मन्त्र बृहस्पति से, फिर अन्य गुरु से करना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

वरणीय वरुण प्रभु वरुपति हों, अर्य्यमा न्याय के अधिपति हों |
हमको परमेश ईशता दो, तुम इन्द्र हमारे धनपति हों ||

की याचना इन्द्र‌ धनपति से, फिर दर दर हमें भटकना क्या
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

अत्यन्त पराक्रम बलपति हो, तुम वेद बृहस्पति श्रुतिपति हो |
तन मानस का बल हमको दो, तुम विष्णु व्याप्त जग वसुपति हो ||

की सन्धि शौर्य के सतपति से, फिर हमें शत्रु से डरना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

प्रिय सखा सुमंगल उन्नति हो, हर सम‌य तुम्हारी संगति हो |
बन मित्र मधुरता अपनी दो, सुख वैभव बल की सम्पति दो ||

मित्रता विष्णु प्रिय जगपति से, फिर पलपल हमें तरसना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

(पं. देवनारायण भारद्वाज रचित गीत स्तुति का प्रथम प्रकाश)

लेखन:
राजेन्द्र आर्य,
362 ए, सुनामी गेट,गुरुनानकपुरा
संगरूर 148001 (पंजाब)

चलभाष : 9041342483

सः

सः पूर्वेषां अपि गुरु कालेनान वच्छेदात.

तच्चक्षुद

तच्चक्षुद्रेवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत!पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद:शतं श्रुणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात !