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AryasamajOnline |
गीत स्तुति (१)ओ३म् शंनो मित्र: शं वरुण: शं नो भवत्वर्य्यमा | पाया गुरु मन्त्र बृहस्पति से, फिर अन्य गुरु से करना क्या | वरणीय वरुण प्रभु वरुपति हों, अर्य्यमा न्याय के अधिपति हों | की याचना इन्द्र धनपति से, फिर दर दर हमें भटकना क्या अत्यन्त पराक्रम बलपति हो, तुम वेद बृहस्पति श्रुतिपति हो | की सन्धि शौर्य के सतपति से, फिर हमें शत्रु से डरना क्या | प्रिय सखा सुमंगल उन्नति हो, हर समय तुम्हारी संगति हो | मित्रता विष्णु प्रिय जगपति से, फिर पलपल हमें तरसना क्या | (पं. देवनारायण भारद्वाज रचित गीत स्तुति का प्रथम प्रकाश) लेखन: चलभाष : 9041342483
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सः
सः पूर्वेषां अपि गुरु कालेनान वच्छेदात.
तच्चक्षुद
तच्चक्षुद्रेवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत!पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद:शतं श्रुणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात !