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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ब्रह्मचर्य के विषय में मूर्खों के विचार

नमस्ते आर्य्यगण,
ब्रहमचर्य के विषय में समाज में कई गलत अवधारणाएँ हैं । ऐसी गलत अवधारणाएँ के पीछे ऐसे साहित्य हैं जिन्हे ऐसे लोगों ने लिखा है जो स्वयं ब्रह्मचारी नहीं थे । ब्रह्मचर्य के विषय में आजकल के तथाकथित संतों ने जो पुस्तकें लिखी हैं उनमें ऐसी ऐसी बातें लिखी है जिन्हें लिखने में शर्म आती है । वे तथाकथित विद्वान बिना कुछ सोचे समझे ऐसी बातें लिख देते हैं जिन्हे पढ़कर किशोर वर्ग सुधरने के बजाए और बिगड़ जाते है । एक उदाहरण देता हूँ । एक पुस्तक में लिखा है कि किसी स्त्री के अमुक अंग को देखने से अमुक व्यक्ति की इंद्रिय संयम को प्राप्त हुई ! उसे वैराग्य हो गया । ऐसे लेख पढ़कर किशोर वर्ग उल्टा पापी बन जाता है । आशाराम बापू के किताब में लिखा है कि 18 से 25 वर्ष के बीच संयम रख लो कल्याण हो जाएगा! अब आप ही बताइये क्या 18 से पूर्व के व्यक्ति ब्रह्मचर्य न रखें ? कई पुस्तकों में पापियों की कहानियाँ लिखीं हैं । उनके अनुभवो का वर्णन है । लेखक की बुद्धि देखो , ऐसी कहानियों से किशोर वर्ग संयमी हो जाएगा क्या ? उल्टा ऐसी कहानियों से सीख लेकर युवा वर्ग पाप कर बैठता है । और दुःखी हो जाता है । ब्रह्मचर्य के विषय में जितना अधिक इन पुस्तकों को पढ़ा जाए उतना ही अधिक बिगाड़ होने लगता है ।
ब्रह्मचर्य रखने कि अचूक दवा -
ब्रह्मचर्य रखने कि अचूक दवा है ब्रह्म(ईश्वर) का यथार्थ विज्ञान । प्रभु की भक्ति । जब तक ईश्वर का यथार्थ ज्ञान नहीं होता तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करना कठिन है । पढ़ाई पर ध्यान दो । प्रभु जी का प्रत्यक्ष कर लो । भोगों से अलग हो जाओ । फिर यम नियम का पालन सरल हो जाता है ।

सही

सही विचार् हेतु धन्यवाद | परन्तु जब तक संस्कारों की परम्परा को हम जीवित नहीं कर पाएँगे तब तक इस राह पर आज के हालात में चल पाना कठिन ही लगता है |

आनन्द‌

ॐ..नमस्ते

ॐ..नमस्ते आदरणीय आनन्द जी,
मुझे एक विद्वान ने कहा था कि वेदों में लिखा है कि "मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति से कुछ भी कर सकता है ।" धन्यवाद

प्रिय

प्रिय आर्य्य बसन्त जी
नमस्ते
अवश्य ही इच्छाशक्ति से ही सभी कार्य होते हैं, तथा जो कुछ‌ भी हम प्राप्त करते हैं वह सब इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है | परन्तु इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिये कि वह असम्भव बातें भी कर सकता है | इसका अभिप्राय केवल यही है कि जो कुछ भी एक‌ जीव के लिये कर पाना सम्भव है उसकी सीमा में रहते हुए अपनी द्दृढ़ इच्छाशक्ति से वह उसमें से कुछ भी प्राप्त कर सकता है | चूंकि यह एक प्राकृतिक सत्य है, इसे स्वीकारने में हमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये |
धन्यवाद
आनन्द्