साम श्रद्धा : मधुमय जीवन (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज)

ओ३म् अभि ते मधुना पयो$थर्वाणो अशिश्रयु: |
देवं देवाय देवयु ||साम ६५२ ||

वे अडिग ध्येय हों प्रत्याशी |
प्रभु परम देव के अभिलाषी ||

कामना देव की करते हैं |
कुछ यत्न साधना करते हैं |
प्रभु परम देव की प्राप्ति हेतु,
हों दिव्य गुणों के अधिशासी ||

ऐसी उत्तम दृढ़ता लाओ |
डगमग कहीं न होने पाओ |
भौतिक जग व्यवहार तुम्हारा
हो आत्म ज्ञान का परिभाषी ||

मधु दुग्ध सात्विक भोजन हों |
मधुमय जीवन आयोजन हों |
आहार सही आधार वही,
हों देव इसी के अभ्यासी ||

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राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब)
चलभाष: 9041342483

अति सुन्दर

अति सुन्दर उपदेश ! हर वाक्य सटीक प्रेरणा दे रहा है |

बहुत 2 धन्यवाद |

आनन्द‌