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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथर्ववेद मन्त्र दोहा चौपाई काव्यानुवाद‌

अथर्ववेद मन्त्र : दोहा चौपाई काव्यानुवाद

ओ३म् स्तुतामया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्र‌विणं ब्रह्मवर्चसम् | मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ||अथर्व. १९|७१|१ ||

हे मेरी पूज्य वेद माता | तू ही मेरी ज्ञान विधाता ||
मैंने तेरी स्तुति गाई | करने लगे मंत्र सुनवाई ||
मेरी माता वरदाता है | सब कुछ तुझसे ही आता है ||
विद्द्या के खिल जाते सरसिज | हो जाते पावन सारे द्विज ||

सभी प्रजा ही द्विज बने, एकज रहे न कोय |
श्रुति विहीन रह जाँय जो, श्रमिक सहायक होय ||

आयु प्राणबल सन्तान श्रेष्ठ | पशु कीर्ति और वैभव यथेष्ठ ||
ज्ञानवान हों तेजवान हो | वेदश्रमी मानव महान हो ||
यहाँ लोक में यह सब पाते | ब्रह्मलोक में हँसते जाते ||

वेद वन्दना हम करें, करें हृदय से ध्यान |
हो कोई वंचित नहीं, सबका हो उत्थान ||

राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब)
9041342483

अति सुन्दर

अति सुन्दर व सरल भाषा में आपने वेदार्थ से हमें कृतार्थ किया |

बहुत 2 धन्यवाद |

आनन्द‌