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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेद नारायण (अथर्ववेद 1.1.1. प्रणेता पं. देवनारायण भारद्वाज)

ओ३म् ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा रुपाणि विभ्रत: |
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्द दधातु मे ||

वेद वाणियों के पती, वाचस्पति भगवान |
यही याचना हम करें, दो हमको प्रभु ज्ञान ||

सत रज तम गुण वाली सत्ता | रवि शशि तारक भूमि महत्ता ||
अहंकार महतत्व प्रकृति कर | तन्मात्रायें फिर पंच युक्तकर ||
गुणित तीन से होवे सप्ता | एक विंश है यही त्रिषप्ता ||
भूत पंच, दस कर्म ज्ञान की | इन्द्रिय गणना पंच प्राण की ||
अन्त: करण एक यह सारे | सुखद पुष्ट हो सभी हमारे ||
तीन बचन कर गुणित विभक्ती | एक विंश यह भाषा शक्ती ||
प्रभु वाचस्पति जगदाधारी | दो हमको वाणी अधिकारी ||

देव दया के धाम ध्रुव, दो हमको वरदान |
वन्दन शील विनीत का, करो ओ३म् कल्याण ||

राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब)
9041342483