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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथर्व- प्रभा : उपकार तुम्हारा जल अपार (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज)

ओ३म् आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन |
महे रणाय चक्षसे ||
अथर्व. १|५|१ |

मेरे प्यारे परमेश्वर जल, हो निश्चय हमको सुखकारी |
दो हमें अन्न ऊर्जा प्यारे, होकर जीवन के उपकारी ||
रमणीक दृश्य जग के देखें, संग्राम कहीं पर भारी हो |
दो हमको अपना बल पोषण, जो लड़ने की तैयारी हो |

ओ३म् यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजय्स्तेह न: |
उशतीरिव मातर: ||
अथर्व.१|५|२|

हे देव तुम्हारे जल का रस, देता हमको कल्याण सदा |
इससे हम जीवन पाते हैं, इससे करते निर्माण सदा ||
तुम देते रहो हमें यह रस, इसका भागीदार बनाओ |
जैसे मातायें सुख देती, तुम वही सदा रस बरसाओ ||

ओ३म् तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ |
आपो जनयथा च न: ||
अथर्व.१|५|३||

तुम जिस पर करते अनुकम्पा, वह शक्तिवान हो जाता है |
मतिवान वही हो जाता है, मतिवान वही हो जाता है ||
तुमने हमको है जन्म दिया, तुम रोग निवारण करते हो |
उपकार तुम्हारा जल अपार, तुम हमको धारण करते हो ||

ओ३म् ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम् |
अपो याचामि भेषजम् ||
अथर्व.१|५|४||

ईश्वरी शक्ति से प्रकट हुई, मानव ने पाई जल धारा |
जो वाँच्छित धन हमको देती, करके नित उपकार हमारा ||
जल देव सुनो प्रार्थना यही, यह माँग हमारी सुन लेना |
सब रोग दूर होते जायें, यह औषधि हमको तुम देना ||

राजेन्द्र आर्य , संगरूर (पंजाब)
9041342483