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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सत्यार्थ प्रकाश से आवश्यक उपदेश

प्रश्न- जो ब्रह्मचारी सन्यासी हैं वे तो ठीक हैं ?

उत्तर- ये आश्रम तो ठीक हैं , परंतु आजकल इनमें भी बहुत-सी गड़बड़ है । कितने ही नाम ब्रह्मचारी रखते हैं और झूठ मूठ जटा बढ़ाकर सिद्धाई करते और जप-पुरश्चरणआदि में फंसे रहते है , विद्या पढ़ने का नाम नहीं लेते कि जिस हेतु से ब्रह्मचरी नाम होता है उस ब्रह्म अर्थात वेद पढ़ने में परिश्रम कुछ भी नहीं करते । वे ब्रह्मचारी बकरी के गले के स्तन के सदृश निरर्थक हैं और जो वैसे सन्यासी विद्याहीन , दंड कमंडलु ले भिक्षामात्र करते फिरते हैं , जो कुछ भी वेदमार्ग की उन्नति नहीं करते , छोटी अवस्था में सन्यास लेकर घूमा करते हैं और विद्याभ्यास को छोड़ देते हैं , ऐसे ब्रह्मचारी और सन्यासी इधर उधर जल , स्थल, पाषाणआदि मूर्तियों का दर्शन , पूजन करते फिरते , विद्या जानकर भी मौन हो रहते , एकांत देश में यथेष्ट खा-पीकर सोते पड़े रहते हैं और ईर्ष्या - द्वेष में फँसकर निंदा , कुचेष्टा करके निर्वाह करते , काषाय वस्त्र और दण्ड ग्रहनमात्र से अपने को कृतकृत्य समझते और सर्वोत्कृष्ट जानकार उत्तम काम नहीं करते वैसे सन्यासी भी जगत में व्यर्थ वास करते हैं और जो सब जगत का हित साधते हैं, वे ठीक हैं ।

सन्यास

सन्यास ग्रहण की आवश्यकता:

जैसे शरीर में शिर की आवश्यकता है, वैसे ही आश्रमों में सन्यासाश्रम की आवश्यकता है क्योंकि इसके बिना विद्दा धर्म कभी नहीं बढ़ सकता और दूसरे आश्रमों को विद्दाग्रहण, गृहकृत्य और तपश्चर्यादि का सम्बन्ध होने से अवकाश बहुत कम मिलता है | पक्षपात छोड़कर वर्तना दूसरे आश्रमों को दुष्कर है | जैसा सन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत का उपकार करता है वैसा अन्य आश्रमी नहीं कर सकता | क्योंकि सन्यासी को सत्यविद्दा से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है उतना अन्य आश्रमी को नहीं मिल सकता | परन्तु जो ब्रहमचर्य से सन्यासी होकर जगत् को सत्य शिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके सन्यासीश्रमी नहीं कर सकता |

सत्यार्थ प्रकाश पंचम समुल्लास: से

राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब)
9041342483